Saturday, June 29, 2013
Friday, June 28, 2013
Adha hai chandrama raat aadhi
Uploaded on Nov 17, 2009
Song-Aadha hai chandrma raat aadhi
Movie - Navrang (1958)
Singer- Asha Bhonsle,Mahendra Kapoor
Lyricist - Bharat Vyas,
Music Director - C Ramchandra
Cast - Sandhya,Manipal ,Keshav Rao Datey, Vastala Deshmukh,Aaga ,Vandana,Ulhas
Producer/Director - V. Shantaram ( Rajaram Vankudre Shantaram )
V. Shantaram, renowned Indian film producer, filmmaker, and actor, most known for his films like Dr. Kotnis Ki Amar Kahani (1946), Amar Bhoopali (1951), Jhanak Jhanak Payal Baje (1955), Do Aankhen Barah Haath (1957) and Navrang (1959), to the path breaking Duniya Na Mane (1937) and Pinjara (1973).
He directed his first film, "Netaji Palkar" in 1927, and in 1929, founded the Prabhat Film Company along with V.G. Damle, K.R. Dhaiber, S. Fatelal and S.B. Kulkarni [2], which he left in 1942 and to form "Rajkamal Kala Mandir" in Mumbai [3], in time 'Rajkamal' became one of most sophisticated studios of the country [4].
He was praised by Charlie Chaplin for his Marathi film MANOOS (English: Man). Charlie Chaplin reportedly liked the film very much.
He was awarded the Indian film industry's highest award, the Dadasaheb Phalke Award, in 1985 and the Padma Vibhushan in 1992.Genre -Musical romantic family Drama
Sandhya has performed some unbelievable tasks in the songs, in addition to singing.
Movie - Navrang (1958)
Singer- Asha Bhonsle,Mahendra Kapoor
Lyricist - Bharat Vyas,
Music Director - C Ramchandra
Cast - Sandhya,Manipal ,Keshav Rao Datey, Vastala Deshmukh,Aaga ,Vandana,Ulhas
Producer/Director - V. Shantaram ( Rajaram Vankudre Shantaram )
V. Shantaram, renowned Indian film producer, filmmaker, and actor, most known for his films like Dr. Kotnis Ki Amar Kahani (1946), Amar Bhoopali (1951), Jhanak Jhanak Payal Baje (1955), Do Aankhen Barah Haath (1957) and Navrang (1959), to the path breaking Duniya Na Mane (1937) and Pinjara (1973).
He directed his first film, "Netaji Palkar" in 1927, and in 1929, founded the Prabhat Film Company along with V.G. Damle, K.R. Dhaiber, S. Fatelal and S.B. Kulkarni [2], which he left in 1942 and to form "Rajkamal Kala Mandir" in Mumbai [3], in time 'Rajkamal' became one of most sophisticated studios of the country [4].
He was praised by Charlie Chaplin for his Marathi film MANOOS (English: Man). Charlie Chaplin reportedly liked the film very much.
He was awarded the Indian film industry's highest award, the Dadasaheb Phalke Award, in 1985 and the Padma Vibhushan in 1992.Genre -Musical romantic family Drama
Sandhya has performed some unbelievable tasks in the songs, in addition to singing.
LYRICS ;-
aadhaa hai chandrmaa raat aadhi
aadhaa hai chandrmaa raat aadhi
rah na jaaye teri meri baat aadhi, mulaaqaat aadhi
aadhaa hai chandrmaa raat aadhi
rah na jaaye teri meri baat aadhi, mulaaqaat aadhi
aadhaa hai chandrmaa
piyaa aadhi hai pyaar ki bhaashhaa
aadhi rahne do man ki abhilaashhaa
piyaa aadhi hai pyaar ki bhaashhaa
aadhi rahne do man ki abhilaashhaa
aadhe chhalke nayan aadhe dhalke nayan
aadhi palkon ki bhi hai barsaat aadhi
rah na jaaye teri meri baat aadhi, mulaaqaat aadhi
aadhaa hai chandrmaa
aas kab tak rahegi adhoori
pyaas hogi nahin kyaa ye poori
aas kab tak rahegi adhoori
pyaas hogi nahin kyaa ye poori
pyaasaa-pyaasaa pawan pyaasaa-pyaasaa chaman
pyaase taaron ki bhi hai baaraat aadhi
aadhaa hai chandrmaa raat aadhi
rah na jaaye teri meri baat aadhi, mulaaqaat aadhi
aadhaa hai chandrmaa
sur aadhaa hai shyaam ne saadhaa
rahaa raadhaa kaa pyaar bhi aadhaa
sur aadhaa hai shyaam ne saadhaa
rahaa raadhaa kaa pyaar bhi aadhaa
nain aadhe khile honth aadhe hile
rahi pal mein milan ki wo baat aadhi
aadhaa hai chandrmaa raat aadhi
rah na jaaye teri meri baat aadhi, mulaaqaat aadhi
aadhaa hai chandrmaa...
Sunday, June 23, 2013
Saturday, June 15, 2013
Thursday, May 30, 2013
Friday, April 19, 2013
इस बार फिर छिडेंगी पीरखाना मेले में सूफी संगीत की सुरें
काअबे वाली गली विच्च यार दा मकान ए...
दुनिया में बहुत ही कम लोग होते हैं जिन्हें इस बात का ख्याल आता है कि हम कौन हैं कहाँ से आये हैं----हजारों में कोई एक व्यक्ति---फिर इस तरह के लोग सोचते हैं और दुनिया के प्रभाव में, माया की माया के प्रभाव में फिर भूल जाते हैं----याद रखता है कोई हजारों में से एक----याद रखने वालों में से भी कोई एक होता है जो इस राह पर सच में कदम आगे बढाता अन्यथा लोग फिर से भूल जाते हैं---खो जाते हैं दुनिया के सपनों की रंगीनी में-----फिर उन हजारों में से भी कोई एक होता है जो इस राह पर मुश्किलें आने के बाद इस यात्रा को जारी रख पाता है---कोई कोई एक होता है जो दुनिया की ज़िम्मेदारी--परिवार की ज़िम्मेदारी---को पूरा भी करता है और इस राह पर आगे भी बढ़ता है----एक तरफ दुनिया की जिम्मेदारियां---दूसरी तरफ खुदा की तलाश,...खुदा की आवाज़----और दिल से दर्द की हुक निकलती है----काअबे वाली गली विच्च यार दा मकान ए...खुदा भी मेहरबान बना रहे और यार भी नाराज़ न हो----बीच का यह मस्ती भरा रास्ता आखिर कौन बताये----जल में रहना और कमल के फूल की तरफ जल से बचे भी रहना---कौन दिखाए मार्ग---इस तरह की बहुत सी बातें इस बार भी होंगीं---लेकिन संगीत के साथ----सुरों के साथ---मस्ती के साथ----इन सुरों को छेड़ेंगे---गुरदास मान---हमसर हयात निजामी, अनीस साबरी, शकील साबरी, टोनी सुल्तान, ललित गोयल, राकेश राधे, अमित धर्म कोटि और सरदार अली---
उत्तर भारत के कोने कोने में पहुंचा पीरखाना लुधियाना मेले का संदेश
लुधियाना के न्यू अग्रवाल पीरखाना में शनिवार से शुरू हो रहे तीन दिवसीय मेले में शामिल होने के लिए लोगों का उत्साह लगातार बढ़ रहा है। इस दरबार के मुख्य सेवादार बंटी बाबा ने मीडिया को बताया 20 अप्रैल को निकलने वाली शोभा यात्रा पर हवाई जहाज़ के ज़रिये पुष्प वर्षा की जाएगी। हर गली बाज़ार में रथ यात्रा का स्वागत करने को लोग पूरी तरह तैयार हो कर इन्जार में बैठे हैं। इस सबंध में निमन्त्रण देने का सिलसिला शुक्रवार को भी जारी रहा। क्या छोटा क्या बढ़ा---बिना किसी भेदभाव के हर घर में निमन्त्रण का संदेश पहुँच चुका है। व्यापारियों, नेतायों, समाजिक प्रतिनिधियों…सभी ने इस मेले में बढ़ चढ़ कर शामिल होने की बात कही है। स्कूली छात्रों से लेकर कालेज के बड़े छात्रों तक, गरीब से लेकर अमीर तक, जन साधारण से लेकर नेतायों तक अब बस एक ही चर्चा है और वह है इस मेले में शामिल होने की। मेले के प्रबंधकों ने भी अत्यंत व्यस्त समय होने के बावजूद श्री राम लीला कमेटी दरेसी ग्राऊंड, महावीर सेवा संस्थान, एसीपी सतीश कुमार, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता राजिंदर कुमार भण्डारी, अकाली दल के वृष्ट नेता हीरा सिंह गाबड़िया इत्यादि सभी ने अपने साथियों सहित पहुंचने का वादा किया है। निमन्त्रण देने के इस कठिन कार्य को पूरा करने में न्यू अग्रवाल पीरखाना दरबार की और से अशोक भारती, नरिंदर गुप्ता, रमन शर्मा, सुखविंदर सिंह, दिलीप थापर और एनी कई सेवादार दिन रात जुटे रहे।
दुनिया में बहुत ही कम लोग होते हैं जिन्हें इस बात का ख्याल आता है कि हम कौन हैं कहाँ से आये हैं----हजारों में कोई एक व्यक्ति---फिर इस तरह के लोग सोचते हैं और दुनिया के प्रभाव में, माया की माया के प्रभाव में फिर भूल जाते हैं----याद रखता है कोई हजारों में से एक----याद रखने वालों में से भी कोई एक होता है जो इस राह पर सच में कदम आगे बढाता अन्यथा लोग फिर से भूल जाते हैं---खो जाते हैं दुनिया के सपनों की रंगीनी में-----फिर उन हजारों में से भी कोई एक होता है जो इस राह पर मुश्किलें आने के बाद इस यात्रा को जारी रख पाता है---कोई कोई एक होता है जो दुनिया की ज़िम्मेदारी--परिवार की ज़िम्मेदारी---को पूरा भी करता है और इस राह पर आगे भी बढ़ता है----एक तरफ दुनिया की जिम्मेदारियां---दूसरी तरफ खुदा की तलाश,...खुदा की आवाज़----और दिल से दर्द की हुक निकलती है----काअबे वाली गली विच्च यार दा मकान ए...खुदा भी मेहरबान बना रहे और यार भी नाराज़ न हो----बीच का यह मस्ती भरा रास्ता आखिर कौन बताये----जल में रहना और कमल के फूल की तरफ जल से बचे भी रहना---कौन दिखाए मार्ग---इस तरह की बहुत सी बातें इस बार भी होंगीं---लेकिन संगीत के साथ----सुरों के साथ---मस्ती के साथ----इन सुरों को छेड़ेंगे---गुरदास मान---हमसर हयात निजामी, अनीस साबरी, शकील साबरी, टोनी सुल्तान, ललित गोयल, राकेश राधे, अमित धर्म कोटि और सरदार अली---
उत्तर भारत के कोने कोने में पहुंचा पीरखाना लुधियाना मेले का संदेश
लुधियाना के न्यू अग्रवाल पीरखाना में शनिवार से शुरू हो रहे तीन दिवसीय मेले में शामिल होने के लिए लोगों का उत्साह लगातार बढ़ रहा है। इस दरबार के मुख्य सेवादार बंटी बाबा ने मीडिया को बताया 20 अप्रैल को निकलने वाली शोभा यात्रा पर हवाई जहाज़ के ज़रिये पुष्प वर्षा की जाएगी। हर गली बाज़ार में रथ यात्रा का स्वागत करने को लोग पूरी तरह तैयार हो कर इन्जार में बैठे हैं। इस सबंध में निमन्त्रण देने का सिलसिला शुक्रवार को भी जारी रहा। क्या छोटा क्या बढ़ा---बिना किसी भेदभाव के हर घर में निमन्त्रण का संदेश पहुँच चुका है। व्यापारियों, नेतायों, समाजिक प्रतिनिधियों…सभी ने इस मेले में बढ़ चढ़ कर शामिल होने की बात कही है। स्कूली छात्रों से लेकर कालेज के बड़े छात्रों तक, गरीब से लेकर अमीर तक, जन साधारण से लेकर नेतायों तक अब बस एक ही चर्चा है और वह है इस मेले में शामिल होने की। मेले के प्रबंधकों ने भी अत्यंत व्यस्त समय होने के बावजूद श्री राम लीला कमेटी दरेसी ग्राऊंड, महावीर सेवा संस्थान, एसीपी सतीश कुमार, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता राजिंदर कुमार भण्डारी, अकाली दल के वृष्ट नेता हीरा सिंह गाबड़िया इत्यादि सभी ने अपने साथियों सहित पहुंचने का वादा किया है। निमन्त्रण देने के इस कठिन कार्य को पूरा करने में न्यू अग्रवाल पीरखाना दरबार की और से अशोक भारती, नरिंदर गुप्ता, रमन शर्मा, सुखविंदर सिंह, दिलीप थापर और एनी कई सेवादार दिन रात जुटे रहे।
हर वर्ग की संगत ने की मेले में आने की पुष्टि
Thursday, February 21, 2013
तंजावुर वीणा
18-फरवरी-2013 19:54 IST
शीघ्र हासिल होगा भौगोलिक संकेतन का दर्जाविशेष लेख/* डॉ. के परमेश्वरन
दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन और सम्मानित संगीत वाद्य तंजावुर वीणा को भौगोलिक संकेतन का दर्जा देने के लिए चुना गया है। भौगोलिक संकेतन पंजीयक, चेन्नई, चिन्नराजा जी नायडू ने आज यह खुलासा किया कि तंजावुर वीणा को भौगोलिक संकेतन दर्जे के लिए आवेदन परीक्षण की प्रक्रिया में है तथा भौगोलिक संकेतन दर्जे के लिए पंजीयन के संबंध में सभी औपचारिकताएं मार्च 2013 तक पूरे हो जाने की संभावना है।
सामान्य रूप से वीणा को एक पूर्ण वाद्य यंत्र माना जाता है। इस एक वाद्य में चार वादन तारों और तीन तंरगित तारों के साथ शास्त्रीय संगीत के सभी आधारभूत अवयव- श्रुति और लय समाहित हैं। इस तरह की गुणवत्ता वाला कोई अन्य वाद्य नहीं है।
नोबल पुरस्कार विजेता सी.वी. रमन ने वीणा की अद्भुत संरचना वाले वाद्य के रूप में व्याख्या की थी। इसके तार दोनों अंतिम सिरों पर तीखे कोण के रूप में नहीं बल्कि गोलाई में हैं। गिटार की तरह इसके तार एकदम गर्दन के सिरे तक नहीं जाते और इसीलिए बहुत तेज़ आवाज़ पैदा करने की संभावना ही इस वाद्य के साथ नहीं है। वाद्य के इस डिज़ाइन के कारण किसी अन्य वाद्य के मुकाबले तार के तनाव पर लागातार नियंत्रण बनाए रखना संभव हो पाता है।
भौगोलिक संकेतन क्या है?
भौगोलिेक संकेतन का प्रयोग किसी कृषि, प्राकृतिक अथवा कृत्रिम उत्पाद के विशिष्ट क्षेत्र में आरंभ को पहचान देने के लिए किया जाता है। भौगोलिक संकेतन पंजीयन यह निश्चित करता है कि वस्तु विशेष में कुछ विशेष गुण्उसके विशेष भौगोलिक संकेत होते हैं।
भौगोलिक संकेतन ट्रेड मार्क से भिन्न्होता है। ट्रेड मार्क व्यपार के लिए प्रयोग होता है जो उत्पाद\सेवा विशेष को अन्य उत्पाद अथवा सेवा से अलग करता है जबकि भौगोलिक संकेतन किसी वस्तु की उस पहचान के लिए प्रयोग होता है जो उसे एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में उत्पन्न्होने के कारण मिली है।
यद्यपि भौगोलिक संकेतन का पंजीयन अनिवार्य नहीं है, लेकिन अतिक्रमण से बचने के लिए यह एक बेहतर कानूनी सुरक्षा है। भौगोलिक संकेतन का पंजीयन सामान्य रूप से 10 वर्ष के लिए होता है। इस अवधि के बाद अगले 10 वर्ष तक के लिए फिर से पंजीयन कराया जा सकता है। यदि फिर से 10 वर्ष की अवधि के लिए पंजीयन नहीं कराया जाता है तो वस्तु विशेष का भौगोलिक संकेतन पंजीयन समाप्त हो जाता है।
तंजावुर वीणा के लिए भौगोलिक संकेतन पंजीयन के लिए आवेदन तंजावुर म्यूजि़कल इंस्ट्रूमेंट वर्कर्स कॉआपरेटिव कॉटेज इंडस्ट्रीयल सोसाइटी लिमिटेड ने किया जिसे तमिलनाडू राज्य विज्ञान एवं तकनीक कांउसिल द्वारा समर्थन दिया गया। आवेदन जून 2010 में किया गया।
तंजावुर वीणा की विशेषता
तंजावुर वीणा की शिल्पकला उन शिलपकारों के कारण अद्भुत है जो तंजावुर शहर के आसपास बसे हैं। यह शहर तमिलनाडू के दक्षिण-पूर्वी तट पर बसे सांस्कृतिक रूप से अद्वितीय और कृषि आधारित ग्रामीण जिले तंजावुर में स्थित है।
तंजावुर की वीणा एक विशेष सीमा तक पुराने हुए जैकवुड पेड़ की लकड़ी से बनाई जाती है। इस वीणा पर की गई शिल्पकारी और विशेष प्रकार से बनाए गए अनुनाद परिपथ (कुडम) के कारण भी तंजावुर वीणा अपने में अद्वितीय है।
तंजावुर वीणा क्या है?
तंजावुर वीणा की लंबाई चार फीट होती है। इस विशाल वाद्य की चौड़ी और मोटी गर्दन के अंत में ड्रैगन के सिर को तराशा जाता है। गर्दन के भीतर अनुनाद परिपथ (कुडम) बनाया जाता है। तंजावुर वीणा में 24 आरियां (मेट्टू ) फिट किए गए हैं ताकि इस पर सभी राग बजाए जा सकें। इन 24 धातू की आरियों को सख्त करने के लिए मधुमक्खी के छत्ते से बने मोम तथा चारकोल पाउडर के मिश्रण को लपेटा जाता है। दो प्रकार की तंजावुर वीणा होती है- एकांथ वीणा और सद वीणा। एकांथ वीणा को लकड़ी के एक ही टुकड़े से बनाया जाता है। जबकि सद वीणा में जोड़ होते हैं। दोनों प्रकार की वीणा को बहुत खूबसूरती के साथ तराशा जाता है और उस पर रंग किया जाता है।
इतिहास
वीणा वैदिक काल में उल्लिखित तीन वैदिक वाद्य यंत्र (बांसूरी और मृदंग) में से एक माना गया है। कला की देवी सरस्वती को सदैव वीणा के साथ दर्शाया जाता है जो इस बात का प्रतीक है कि संगीत (वीणा का पर्याय) सभी कलाओं में सबसे श्रेष्ठ है।
नारद मुनि जिन्होंने संत त्यागराज को उनके प्रबंध संगीत शास्त्र के लिए आशीर्वाद दिया (संत त्यागराज ने नारद मुनि को गुरु का दर्जा दिया था) स्वयं वीणा वादन में विशेषज्ञ थे और वे महाथी नामक वीणा बजाते थे।
ऐसा विश्वास किया जाता है कि कालीदास के काव्य जीवन की शुरूआत सरस्वती के प्रमुख श्लोक ‘माणिक्य वीणम उपाललयंथिम’। उनकी नवरत्न माला के वीणा के पांच संदर्भ हैं-9 छंदों का एक संयोग।
भारत सरकार के प्रकाशन प्रभाग से ‘भारत के संगीत वाद्ययंत्र’ शीर्षक से प्रकाशित (द्वारा एस श्री कृष्णस्वामी 1993) पुस्तक कहती है कि तंजावुर के शासक रघुनाथ नायक और उनके प्रधानमंत्री एवं संगीतज्ञ गोविन्द दीक्षित ने उस समय की वीणा- सरस्वती वीना-24 तानों के साथ परिष्कृत किया था, जिससे इस पर सारे राग बजाये जा सके। इसीलिए इसका नाम ‘तंजावुर वीना’ है और इसी दिन से रघुनाथ नायक को तंजावुर वीना का जनक माना जाता है।
यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि वीना के पहले संस्करण में इससे कम 22 परिवर्तनीय तान थे जिनको व्यवस्थित किया जा सकता था। तानों के इस समायोजन में ( प्रत्येक सप्तक के लिए 12) कर्नाटक संगीत पद्धति की प्रसिद्ध 72 मेलाक्रता रागों के विकास की राह प्रशसत की। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि कर्नाटक संगीत प्रद्घति तंजावुर वीणा तकनीक के आसपास विकसित हुई है।
तंजावुर वीणा कैसे बनी ?
तंजावुर वीणा के निर्माण में दर्द संवेदना, समय खर्च होता है और इसमें विशिष्ट शिल्पकारी संलग्न हैं। यह प्राय: जैकुड की लकडी से निर्मित होती है। इसको रंगों और लकडी के महीन काम से सजाया जाता है, जिसमें देवी-देवताओं की फूल और पत्तियों की तस्वीरें बनी होती हैं। यह तंजावुर वीना को देखने में अनुठा और मनमोहक बनाता है।
प्रसिद्ध वीना वादक
20 वीं सदी के कर्नाटक शैली के एक बहुत प्रसिद्ध कलाकार जो विशेष तौर पर बेहद मनमोहक तरीके से वीणा वादन के लिए जानी जाती है। उनकी पहचान वीणा के साथ इस तरह से एकाकार हो गयी है कि उन्हें वीणा धनाम्मल के नाम से जाना जाता है। पिछले साल डाक विभाग ने उन पर एक डाक टिकट भी जारी किया।
कराईकुडी बंधु– जिसमें से एक वीणा को लंब स्थिति में रखकर बजाते हैं- पिछले सालों में सुप्रसिद्ध वीणा वादक हुए हैं। ईमानी शंकर शास्त्री, दुरईस्वामी अयैंगर, बालाचंद्र, एमके कल्याण कृष्णा भंगवाथेर, के वेंकटरमण और केरल से एम उन्नीकृष्णन 20 वीं सदी के जाने माने वीणा वादक हुए हैं। वीणा वादन की कला को 21 वी सदी में भी कुछ विशेष कलाकारों द्वारा जिसमें राजकुमार रामवर्मा (त्रावणकौर शाही परिवार से), गायत्री, अन्नतपदनाभम, डॉ. जयश्री कुमारेश दूसरे अन्य भी शामिल रहे।
*लेखक पत्र सूचना कार्यालय, मदुरै में सहायक निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।
वि.कासोटिया/महेश राठी/रजनी/मलिक-43
शीघ्र हासिल होगा भौगोलिक संकेतन का दर्जाविशेष लेख/* डॉ. के परमेश्वरन
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| Courtesy Photo |
सामान्य रूप से वीणा को एक पूर्ण वाद्य यंत्र माना जाता है। इस एक वाद्य में चार वादन तारों और तीन तंरगित तारों के साथ शास्त्रीय संगीत के सभी आधारभूत अवयव- श्रुति और लय समाहित हैं। इस तरह की गुणवत्ता वाला कोई अन्य वाद्य नहीं है।
नोबल पुरस्कार विजेता सी.वी. रमन ने वीणा की अद्भुत संरचना वाले वाद्य के रूप में व्याख्या की थी। इसके तार दोनों अंतिम सिरों पर तीखे कोण के रूप में नहीं बल्कि गोलाई में हैं। गिटार की तरह इसके तार एकदम गर्दन के सिरे तक नहीं जाते और इसीलिए बहुत तेज़ आवाज़ पैदा करने की संभावना ही इस वाद्य के साथ नहीं है। वाद्य के इस डिज़ाइन के कारण किसी अन्य वाद्य के मुकाबले तार के तनाव पर लागातार नियंत्रण बनाए रखना संभव हो पाता है।
भौगोलिक संकेतन क्या है?
भौगोलिेक संकेतन का प्रयोग किसी कृषि, प्राकृतिक अथवा कृत्रिम उत्पाद के विशिष्ट क्षेत्र में आरंभ को पहचान देने के लिए किया जाता है। भौगोलिक संकेतन पंजीयन यह निश्चित करता है कि वस्तु विशेष में कुछ विशेष गुण्उसके विशेष भौगोलिक संकेत होते हैं।
भौगोलिक संकेतन ट्रेड मार्क से भिन्न्होता है। ट्रेड मार्क व्यपार के लिए प्रयोग होता है जो उत्पाद\सेवा विशेष को अन्य उत्पाद अथवा सेवा से अलग करता है जबकि भौगोलिक संकेतन किसी वस्तु की उस पहचान के लिए प्रयोग होता है जो उसे एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में उत्पन्न्होने के कारण मिली है।
यद्यपि भौगोलिक संकेतन का पंजीयन अनिवार्य नहीं है, लेकिन अतिक्रमण से बचने के लिए यह एक बेहतर कानूनी सुरक्षा है। भौगोलिक संकेतन का पंजीयन सामान्य रूप से 10 वर्ष के लिए होता है। इस अवधि के बाद अगले 10 वर्ष तक के लिए फिर से पंजीयन कराया जा सकता है। यदि फिर से 10 वर्ष की अवधि के लिए पंजीयन नहीं कराया जाता है तो वस्तु विशेष का भौगोलिक संकेतन पंजीयन समाप्त हो जाता है।
तंजावुर वीणा के लिए भौगोलिक संकेतन पंजीयन के लिए आवेदन तंजावुर म्यूजि़कल इंस्ट्रूमेंट वर्कर्स कॉआपरेटिव कॉटेज इंडस्ट्रीयल सोसाइटी लिमिटेड ने किया जिसे तमिलनाडू राज्य विज्ञान एवं तकनीक कांउसिल द्वारा समर्थन दिया गया। आवेदन जून 2010 में किया गया।
तंजावुर वीणा की विशेषता
तंजावुर वीणा की शिल्पकला उन शिलपकारों के कारण अद्भुत है जो तंजावुर शहर के आसपास बसे हैं। यह शहर तमिलनाडू के दक्षिण-पूर्वी तट पर बसे सांस्कृतिक रूप से अद्वितीय और कृषि आधारित ग्रामीण जिले तंजावुर में स्थित है।
तंजावुर की वीणा एक विशेष सीमा तक पुराने हुए जैकवुड पेड़ की लकड़ी से बनाई जाती है। इस वीणा पर की गई शिल्पकारी और विशेष प्रकार से बनाए गए अनुनाद परिपथ (कुडम) के कारण भी तंजावुर वीणा अपने में अद्वितीय है।
तंजावुर वीणा क्या है?
तंजावुर वीणा की लंबाई चार फीट होती है। इस विशाल वाद्य की चौड़ी और मोटी गर्दन के अंत में ड्रैगन के सिर को तराशा जाता है। गर्दन के भीतर अनुनाद परिपथ (कुडम) बनाया जाता है। तंजावुर वीणा में 24 आरियां (मेट्टू ) फिट किए गए हैं ताकि इस पर सभी राग बजाए जा सकें। इन 24 धातू की आरियों को सख्त करने के लिए मधुमक्खी के छत्ते से बने मोम तथा चारकोल पाउडर के मिश्रण को लपेटा जाता है। दो प्रकार की तंजावुर वीणा होती है- एकांथ वीणा और सद वीणा। एकांथ वीणा को लकड़ी के एक ही टुकड़े से बनाया जाता है। जबकि सद वीणा में जोड़ होते हैं। दोनों प्रकार की वीणा को बहुत खूबसूरती के साथ तराशा जाता है और उस पर रंग किया जाता है।
इतिहास
वीणा वैदिक काल में उल्लिखित तीन वैदिक वाद्य यंत्र (बांसूरी और मृदंग) में से एक माना गया है। कला की देवी सरस्वती को सदैव वीणा के साथ दर्शाया जाता है जो इस बात का प्रतीक है कि संगीत (वीणा का पर्याय) सभी कलाओं में सबसे श्रेष्ठ है।
नारद मुनि जिन्होंने संत त्यागराज को उनके प्रबंध संगीत शास्त्र के लिए आशीर्वाद दिया (संत त्यागराज ने नारद मुनि को गुरु का दर्जा दिया था) स्वयं वीणा वादन में विशेषज्ञ थे और वे महाथी नामक वीणा बजाते थे।
ऐसा विश्वास किया जाता है कि कालीदास के काव्य जीवन की शुरूआत सरस्वती के प्रमुख श्लोक ‘माणिक्य वीणम उपाललयंथिम’। उनकी नवरत्न माला के वीणा के पांच संदर्भ हैं-9 छंदों का एक संयोग।
भारत सरकार के प्रकाशन प्रभाग से ‘भारत के संगीत वाद्ययंत्र’ शीर्षक से प्रकाशित (द्वारा एस श्री कृष्णस्वामी 1993) पुस्तक कहती है कि तंजावुर के शासक रघुनाथ नायक और उनके प्रधानमंत्री एवं संगीतज्ञ गोविन्द दीक्षित ने उस समय की वीणा- सरस्वती वीना-24 तानों के साथ परिष्कृत किया था, जिससे इस पर सारे राग बजाये जा सके। इसीलिए इसका नाम ‘तंजावुर वीना’ है और इसी दिन से रघुनाथ नायक को तंजावुर वीना का जनक माना जाता है।
यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि वीना के पहले संस्करण में इससे कम 22 परिवर्तनीय तान थे जिनको व्यवस्थित किया जा सकता था। तानों के इस समायोजन में ( प्रत्येक सप्तक के लिए 12) कर्नाटक संगीत पद्धति की प्रसिद्ध 72 मेलाक्रता रागों के विकास की राह प्रशसत की। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि कर्नाटक संगीत प्रद्घति तंजावुर वीणा तकनीक के आसपास विकसित हुई है।
तंजावुर वीणा कैसे बनी ?
तंजावुर वीणा के निर्माण में दर्द संवेदना, समय खर्च होता है और इसमें विशिष्ट शिल्पकारी संलग्न हैं। यह प्राय: जैकुड की लकडी से निर्मित होती है। इसको रंगों और लकडी के महीन काम से सजाया जाता है, जिसमें देवी-देवताओं की फूल और पत्तियों की तस्वीरें बनी होती हैं। यह तंजावुर वीना को देखने में अनुठा और मनमोहक बनाता है।
प्रसिद्ध वीना वादक
20 वीं सदी के कर्नाटक शैली के एक बहुत प्रसिद्ध कलाकार जो विशेष तौर पर बेहद मनमोहक तरीके से वीणा वादन के लिए जानी जाती है। उनकी पहचान वीणा के साथ इस तरह से एकाकार हो गयी है कि उन्हें वीणा धनाम्मल के नाम से जाना जाता है। पिछले साल डाक विभाग ने उन पर एक डाक टिकट भी जारी किया।
कराईकुडी बंधु– जिसमें से एक वीणा को लंब स्थिति में रखकर बजाते हैं- पिछले सालों में सुप्रसिद्ध वीणा वादक हुए हैं। ईमानी शंकर शास्त्री, दुरईस्वामी अयैंगर, बालाचंद्र, एमके कल्याण कृष्णा भंगवाथेर, के वेंकटरमण और केरल से एम उन्नीकृष्णन 20 वीं सदी के जाने माने वीणा वादक हुए हैं। वीणा वादन की कला को 21 वी सदी में भी कुछ विशेष कलाकारों द्वारा जिसमें राजकुमार रामवर्मा (त्रावणकौर शाही परिवार से), गायत्री, अन्नतपदनाभम, डॉ. जयश्री कुमारेश दूसरे अन्य भी शामिल रहे।
*लेखक पत्र सूचना कार्यालय, मदुरै में सहायक निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।
वि.कासोटिया/महेश राठी/रजनी/मलिक-43
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