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Sunday, February 4, 2024

फिल्म "आदमी" के गीत आज भी जादू भरा असर रखते हैं

फ़िल्में,ब्रह्मण्ड, हकीकतें और ज़िन्दगी 

फिल्मों की दुनिया: 04 फरवरी 2024: (कार्तिका कल्याणी सिंह-मीडिया लिंक//संगीत स्क्रीन डेस्क)::

असली ज़िन्दगी में फिल्मों का सच भी अक्सर बहुत बड़ा ही रहा बेशक उसे किसी ने स्वीकार किया हो या न किया हो। कहने को जो भी कह लिया जाए लेकिन फिल्मों की हर कहानी का आधार किसी न किसी ज़िन्दगी की कोई न कोई असली घटना ही बनती रही। बस नाम और पात्र बदल जाते थे। जगहों और स्थानों के नाम बदल दिए जाते थे लेकिन दर्द वही रहता था। संवेदना वही रहती थी। गीत-संगीत और कला की तकनीक से उसकी धार को तीखा ज़रूर कर दिया जाता था। इस तरह बहुत सी गहरी बातें आम लोगों के दिल में भी उतरने लगतीं। उनकी उलझी हुई बातें भी लोगों की समझ में आने लगतीं। 

वर्ष  1968 में एक फिल्म आई थी आदमी। इसका निर्देशन ए॰ भीमसिंह ने किया है और इसमें दिलीप कुमार, वहीदा रहमान, मनोज कुमार, सिमी गरेवाल और प्राण हैं। यह फ़िल्म 1962 की एक तमिल फ़िल्म की रीमेक है। तमिल फिल्म का नाम था- आलयमानि (Aalayamani)  

इस फिल्म के लेखक थे अख्तर उल ईमान, कौशल भारती, रामा राव, और शमन्ना।  निर्माता थे पी एस  वीरप्पा। फिल्म ज़िंदगी और दुनिज़ा की उसी पुरानी कहानी पर आधारित थी जिसमें गरीबी भी होती है, संघर्ष भी होता है, इश्क और प्रेम का दौर भी आता है और हादसे भी होते हैं। इनके साथ ही एक बार ऐसा वक़्त भी आता है जब लगता है सब कुछ तबाह हो गया। इस तबाही के साथ ही बड़ा झटका तब लगता है जब अपना प्रेम भी साथ छोड़ जाता है। जिनको इंसान अपनी दुनिया समझता वही धोखा दे जाते हैं। बेवफाई की एक नई कहानी सामने आती है। इसके गीत लिखे थे जनाब शकील बदायुनी साहिब ने और जादूभरा संगीत था जनाब नौशाद साहिब का। 

इस फिल्म के दिल को छूते हुए सभी गीत बहुत हिट भी हुए थे। इस फिल्म में छह गीत थे और सभी एक से बढ़ कर कर एक थे। एक गीत था-कल के सपने आज भी आना इसे सुरों की मलिका लता मंगेशकर ने गाया था। करीब पौने चार मिनट (3:41) का गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था। एक और गीत था--आज पुरानी राहों से--इसे आवाज़ दी थी मोहम्मद रफ़ी साहिब ने। यह गीत पांच मिंट से भी बड़ा था-(5:10) अवधि का गीत लेकिन यह श्रोता को भी और दर्शक को भी बांधे रखता है। इसी तरह (4:38) अवधि का एक और गीत तरह था इसी फिल्म में जिसके बोल थे-मैं टूटी हुई एक नैया हूँ इसे भी मोहम्म्द रफ़ी  साहिब ने ही यादगारी आवाज़ दी थी। फिल्म के केंद्रीय बिंदु इंसान के साथ होने वाले धोखे और फरेब की बात थी। धोखे और फरेब की बात करता हुआ एक और बहुत ही लोकप्रिय गीत था--ना आदमी का कोई भरोसा रफ़ी साहिब की आवाज़ में ही था और इसकी अवधि थी-(3:52) उन दिनों जब यह फिल्म रिलीज़ हुई तो इसके गीत गली गली और घर घर में सुने जाते थे। यह गीत भी उन दिनों बहुत हिट हुआ। एक गीत और था लता मंगेशकर-कारी बदरिया मारे लहरिया इसकी अवधि थी (4:25) इस गीत ने भी अपना जादू दिखाया था उस दौर में। 

इसी फिल्म का एक और गीत लोकप्रियता की बुलंदी को छू गया था उन दिनों। तीन आवाज़ों ने इस गीत में जादू जगाया और वह भी कमाल का। रफ़ी साहिब का अपना अंदाज़ रहा, महेंद्र कपुर साहिब का अपना और तलत महमूद साहिब का अपना अंदाज़ रहा। हर अंदाज़ कमाल का था। गीत के बोल हैं- 

कैसी हसीन आज बहारों की रात है-एक चाँद आसमां पे है एक मेरे साथ है..

मन की कल्पना में जब दो चांद उभरते हैं तो कमाल का दृश्य बनता है। एक चांद ज़मीन पर और दूसरा आसमान पर। ब्रह्मण्ड में यदि ऐसा हो जाए तो कैसा रहेगा भला? वैसे जब दो चांद नज़र आने की संभावना बनती है तो उसका ज्योतिषीय और खगोलीय अर्थ भी बनता है जिसकी चर्चा आप आराधना टाईम्ज़ में पढ़ सकते हैं।