इस आवाज़ में हैं कई खूबियां लेकिन सामने आएंगी 14 को
Wednesday, October 13, 2021
प्रेसक्लब मोहाली में प्रीत थिंद के गीत की प्री-लांचिंग मीडिया रिलीज़
Friday, September 3, 2021
पाल सिंह समायों ने रिलीज़ किया अपने युगल गीत का पोस्टर
Friday: 3rd September 2021 at 3:07 pm
हमारी अंतरात्मा की खुराक है "पंजाबी संस्कृति" और इसमें हथियारों के लिए कोई स्थान नहीं
पंजाबी युगल गीत "वजदी ए ताड़ी" का औपचारिक विमोचन पांच को
मोहाली: 3 सितंबर 2021: (गुरजीत बिल्ला//पंजाब स्क्रीन//संगीत स्क्रीन)::
हथियारों की बातें अब तक बहुत हुई। इस तरह की बातों का चलन पिछले कुछ दशकों में बहुत तेज़ी से बढ़ा भी था। परिणाम यह हुआ कि पंजाब ने बहुत ही नाज़ुक दिन भी देखे। बहुत खून बहा इस धरती पर। रंगीन चरखे का संगीत तो विलुप्त ही हो गया था। तीज के मेले भी बंद जैसे ही हो गए थे। पंजाब का नाम केवल हथियारों के साथ जुड़ता चला गया। इसी बहाने पंजाब को बदनाम भी बुरी तरह से किया गया और पंजाब का खून भी बहुत बहा। बहुत से घरों के चिराग हमेशां के लिए बुझ गए। बहुत मुश्किलों से शांति लौटी जो कि अभी भी आशंकित सी है। अभी भी खतरे मंडरा रहे हैं। इसी बीच कुछ लोगों ने कोशिश की कि वह अमन-अमान का माहौल वापिस लौट सके। इसकी ज़रूरत जब शिद्दत से महसूस की गई तो हथियारों का विरोध भी शुरू हुआ। इस तरह का स्वर एक बार फिर सुनाई दिया मोहाली प्रेस क्लब में हुई एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान।
पंजाबी सांस्कृतिक विरासत को जो लोग संभाल कर बैठने का दावा कर रहे हैं उनमें एक पाल सिंह समायों भी हैं। करीब ढाई तीन दशक से सक्रिय होने का दावा है उनका। उन्होंने अपनी संस्कृति और विरासत से टूट रही युवा पीढ़ी को पंजाबी लोक नाच, गिद्दे, झूमर इत्यादि से जोड़ कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी नाम भी कमाया है। इस तरह साथ साथ पंजाबी गायन में अपना अलग स्थान भी बनाया है। जानीमानी गायका गुरलेज़ अख्तर के साथ उनकी जोड़ी हिट भी बहुत हुई। आज इस जोड़ी ने अपने गीत "वजदी ए ताड़ी" का पोस्टर भी रिलीज़ किया। इस गीत को लिखा है सुखपाल औजला ने और संगीत तैयार किया है पाल सिद्धू ने। वीडियो डायरेक्शन में कैमरे से हुए फिल्मांकन को चार चाँद लगाए हैं स्टालिनवीर ने। यह गीत अमेरिका की म्युज़िक कम्पनी टोटल एंटरटेनमेंट के प्रमुख अवतार लाख की तरफ से रिलीज़ किया गया।
इस पत्रकार सम्मेलन में समायों ने कहा,"यह हमारे पंजाबी कल्चर की त्रासदी है की अब हमारे गीतों में तुम्बी की जगह हथियारों और बंदूकों ने ले ली है। बार बार एक ही चीज़ को दिखाए जाने का परिणाम यह हुआ कि युवा पीढ़ी उसी तरफ आकर्षित होने लगी जो की पूरी तरह गलत है। हमारा कल्चर अब गाँवों में से भी खत्म होता जा रहा है। लोक बोलियां, भंगड़ा और गिद्दा इत्यादि का सहारा ले कर ही इसे फिर से गाँवों में पुनर्जीवित किया जा सकता है। उन्होंने कहा की हमारी टीम इसी मकसद के लिए 70 तीज से सबंधित करवाए हैं। गांवों के युवाओं, बच्चों और बज़ुर्गों ने इसे बेहद सराहा। महिलाओं ने भी इसकी तारीफ़ की।
पाल सिंह समायों ने यह भी कहा कि 2011 में उनकी पुस्तक गिद्द्या पिंड वड़ वे। इसके बाद गुर्लेज अख्तर के साथ अपना गीत जोर जट्ट रिलीज़ किया। इसके साथ ही उन्होंने मीडिया को "महिंदी वाले हथां नाल वजदी ए ताड़ी" भी गा कर सुनाया। उन्होंने कहा कि जानीमानी कलाकार डाक्टर प्रभशरण कौर ने भी इस गीत की बहुत तारीफ़ की है।
इस अवसर पर वीडियो डा. डायरेक्टर स्टालिनवीर ने भी इस गीत के फिल्मांकन और सम्पादन के दौरान हुए अनुभव सुनाए। इसे बनाने के लिए गाँवों के कच्चे घरों में विशेष तौर पर शूटिंग की गई। उन्होंने यह एक घर परिवार में बैठ कर देखा जा सकने वाला गीत है। साथ ही यह गीत विदेशी संस्कृति और फैशन से भी दूर है। टीम के दुसरे सदस्य भी इस अवसर पर मौजूद रहे।
Tuesday, October 7, 2014
संगीत को नए अंदाज़ और सम्मान बख्शने वाली बेगम अख्तर की यादें

Thursday, May 15, 2014
संगीत की दुनिया: उत्तर केरल में पंचवाद्यम और पूरम
विशेष लेख//क्षेत्रीय झलक --*डॉ. के. परमेश्वरन
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| इस तस्वीर में कलाकार पूरी गति से पंचवाद्यम बजाते हुए देखे जा सकते हैं |
स्थानीय मंदिर में पूरम त्यौहार मनाया जाता है। सबसे बड़ा और रंगारंग उत्सव त्रिशूर के वडकुमनाथन मंदिर में आयोजित किया जाता है जिसे त्रिशूरपुरम कहते हैं। यह त्यौहार मलयाली महीने मेडम (अप्रैल/मई) में मनाया जाता है। इसके कुछ ही समय बाद त्रिशूर में अरट्टूपुझा पूरम मनाया जाता है, इस अवसर पर लगभग 60 सजे-धजे हाँथियों का जुलूस निकाला जाता है। इस वर्ष अरट्टूपुझा पूरम 11 अप्रैल को मनाया जा रहा है।
दक्षिण भारत में त्रिशूर शहर से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित अरट्टूपुझा एक गांव है जो केरल के त्रिशूर जिले में पुट्टुकाड के पास पड़ता है। अरट्टूपुझा को केरल की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता है। यह करूवनूर नदी के तट पर स्थित है। अरट्टूपुझा मंदिर इस वार्षिक त्यौहार का केंद्रबिंदु होता है। इस मौके पर पारम्परिक वाद्यवृंदों और चमकते-दमकते हौदों से सजे हुए हाथियों की शोभायात्रा निकाली जाती है।
कई वर्ष पूर्व कोच्चि रियासत के धुरंधर शासक सक्थन थाम्पूरन के शासनकाल में त्रिशूर पूरम की शुरूआत हुई थी। तब से यह राज्य का शानदार त्यौहार बन गया है। कहा जाता है कि इस शक्तिशाली शासक ने दुर्घटनावश एक हाथी का सिर कलम कर दिया था और इसी का प्रायश्चित करने के लिए उसने शानदार पूरम त्यौहार मनाने की शुरूआत की। दुर्घटनावश मारे गए हाथी को स्थानीय लोग वेलीचपाडु कहते थे, जिसका मतलब एक ऐसा जीव जो स्थानीय देवताओं के प्रवक्ता के रूप में काम करता है।
वाद्यवृदों की लय
पंचवाद्यम वाद्यवृंदों की एक लय है जिसमें लगभग 100 कलाकार पाँच विभिन्न वाद्यवृंद बजाते हैं। यह पूरम उत्सव का प्रमुख परिचायक होता है। पंचवाद्यम का शाब्दिक अर्थ है पाँच वाद्यवृंदों की सामूहिक ध्वनि। यह मुख्य रूप से मंदिर कलात्मक क्रिया है जिसका विकास केरल में हुआ है। पाँच वाद्यवृंदों में से तिमिला, मद्दलम, इलातलम और इडक्का थाप देकर बजाने वाले यंत्र हैं जबकि पाँचवाँ वाद्यवृंद ‘कोंबू’, फूंककर बजाया जाता है।
चेंडा मेलम की तरह पंचवाद्यम भी पिरामिड जैसा एक लयवद्ध ध्वनि समूह है जिसकी आवाज लगातार बढ़ती जाती है। इसकी थाप बीच-बीच में आनुपातिक रूप से घटती भी है। लेकिन चेंडा मेलम के विपरीत पंचवाद्यम में अलग-अलग वाद्यों का उपयोग किया जाता है (हालांकि इलातलम और कोंबू का प्रयोग दोनों ही विधा में किया जाता है)। ये वाद्य किसी धार्मिक अनुष्ठान से जुड़े नहीं हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें कलाकार अपनी रूचि के अनुसार थाप देकर तिमिला मद्दलम और इडक्का की ध्वनियों में बदलाव कर सकता है।
पंचवाद्यम में सात प्रकार के त्रिपुड प्रयुक्त होते हैं। ये ताल विभिन्न प्रकार के होते हैं। चेम्पट तालम आठ थापों वाले होते हैं, सिर्फ आखिर में इसका इस्तेमाल नहीं होता। इस लय में 896 थाप होते हैं जिनमें से प्रथम चरण में 448 और दूसरे चरण में 224 का इस्तेमाल किया जाता है। चौथे चरण में 112 थाप और पांचवें चरण में 56 थापों का प्रयोग होता है। इसके बाद पंचवाद्यम में और कई चरण आते हैं और इस लय की ध्वनि 28, 14, 7 और इसी तरह से घटती जाती है।
पंचवाद्यम मूल रूप से एक सामंती कला है या नहीं अथवा इसकी लय मंदिर की परम्पराओं के अनुसार विकसित हुई और इसमें कितना समय लगा, यह विद्वानों की बहस का विषय है। कुछ भी हो, लिखित इतिहास से पता चलता है कि जिस रूप में आज पंचवाद्यम मौजूद है इसका अस्तित्व 1930 से है। प्रारंभिक रूप से पंचवाद्यम मद्दलम कलाकारों के दिमाग की उपज थी, इनके नाम हैं- वेंकिचन स्वामी (तिरूविल्वमल वेंकटेश्वर अय्यर) और उनके शिष्य माधव वारियर। उन्होंने अतिंम तिमिल वाद्य विद्वान अन्नमानादा अच्युत मरार और चेंगमानाद सेखर कुरुप के सहयोग से इसको विकसित किया। कहा जाता है कि इन नाद विद्वानों ने पंचवाद्यम को पाँच ध्वनियों का इस्तेमाल करते हुए अन्य वाद्यवृदों की ध्वनि को इसमें बुद्धिमतापूर्ण ढंग से मिलाकर विकसित किया। यह लय लगभग दो घंटे चलती है और इसमें अनेक ऐसी ध्वनियां शामिल हैं जो एक-दूसरे की पूरक होती हैं।
देखने योग्य सौंदर्य
केरल के मंदिरों में गूंजन वाले पंचवाद्यम से सुखद अनुभूति होती है। कला के इस रूप में कलाकार एक-दूसरे के सामने दो अर्द्धचंद्राकार पंक्तियों में खड़े होते हैं। हालांकि, चेंड मेलम जैसे अन्य शास्त्रीय संगीत स्वरूपों के विपरीत, पंचवाद्यम स्पष्ट रूप से शुरूआत में ही तीव्र गति पर आ जाता है और इसीलिये शुरू से ही यह देखने में अच्छा लगता है, भले ही इसमें तीन लम्बी शंख ध्वनियां शामिल की गई हैं।
पंचवाद्यम का संचालन एक तिमिला कलाकार करता है और उसमें अनेक वाद्यवृंद कलाकार शामिल होते हैं। उनके पीछे इलातलम बजाने वाले पंक्तिबद्ध खड़े होते हैं। उनके सामने कतार बनाकर मद्दलम बजाने वाले होते हैं। कोंबू बजाने वाले उनके भी पीछे होते हैं। इडुक वादकों की कतार आमतौर पर तिमिला और मद्दलम वादकों की पंक्ति के पीछे होती है।
मद्दलम और तिमिला पीटकर बजाने वाले संगीत वाद्य हैं। मद्दलम दोनों हाथों से बजाया जाता है जबकि तिमिला बजाने में काफी मुश्किल होती है और वह दोनों हाथों और हथेलियों के मात्र एक तरफ से बजाया जाता है। बुनियादी तौर पर इलातलम ढाल की तरह होते हैं जिन्हें समय और गति बदलने के समय सूचक रूप में बजाते हैं।
कौम्बू फूंक कर बजाया जाने वाला वाद्यवृंद है लेकिन पंचवाद्यम में कौबू का भी काम पड़ता है और यह मद्दलम और तिमिला कलाकारों की संगत में बजाया जाता है। (पसूका)
*सहायक निदेशक, पत्र सूचना कार्यालय, मदुरई
वि.कासोटिया/एएम/आरएसएस/एमके/एनएस/- 83
Wednesday, May 14, 2014
Duniya Vaalo Takte Raho-
Courtesy:AMPS0521//YouTube
Friday, December 27, 2013
Nagma - E - Rooh: Rekha Surya (+प्लेलिस्ट)
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| Rekha Surya |
The infusion of spirituality into an essentially romantic genre is a unique part of her repertoire. The ancient literary traditions she draws from have both South Asian Muslim and Hindu cultural references. Before singing, by lucidly explaining her mystical songs and other poetry of her genre, she demystifies Hindustani Light Classical Music for uninitiated audiences.
A Doordarshan presentation...





